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हर शिविर पूर्व साधकों के दान से संभव होता है, जो कृतज्ञता के भाव से दिया जाता है ताकि दूसरे भी साधना कर सकें। उनकी सेवा के साथ यही दान नाल और खेयादा के शिविरों के संचालन, प्रबंधन से लेकर आवास और भोजन तक का खर्च उठाते हैं।
सूर्योदय के समय लाल छतों वाला केंद्र का दो-मंज़िला भवन, नीची बाड़ों और नन्हे पेड़ों के बीच उस तक जाता रास्ता।
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