परिचय
जैन दार्शनिक नींव
सत्य साधना जैन दर्शन के शाश्वत सत्यों और भगवान महावीर की प्रत्यक्ष शिक्षाओं में गहराई से निहित है। इसके मूल में, यह साधना मोक्ष को बाहरी कर्मकांडों से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं, बल्कि अपने शुद्ध, चेतन स्वरूप (शुद्ध चेतना) की प्रत्यक्ष अनुभूति मानती है। भगवान महावीर ने सिखाया कि सच्चा संयम, अहिंसा और आंतरिक स्थिरता तब आरंभ होती है जब मन बाहर भटकना छोड़कर समता के साथ अपने ही विकारों को देखता है।
इस परंपरा में ध्यान, सम्यक् चारित्र और सम्यक् दृष्टि का व्यावहारिक रूप है। इंद्रियों को बाहरी विक्षेपों से हटाकर और सजगता को भीतर की ओर मोड़कर, साधक शारीरिक संवेदनाओं और मन के उतार-चढ़ाव को बिना राग या द्वेष के देखना सीखता है। यह क्रमबद्ध आत्म-निरीक्षण जीव को गहरे मानसिक कर्मों से शुद्ध करता है, भीतर की अशांति को मिटाता है, और उस अडिग शांति को प्रकट करता है जो सच्चे स्वरूप में ही निहित है।
खरतरगच्छ परंपरा
खरतरगच्छ 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर की परंपरा में है। इसके प्रमुख इस साधना को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं।
10वीं से 15वीं शताब्दी के बीच इस परंपरा में चार दादा गुरुदेव हुए: श्री जिनदत्त सूरीजी, मणिधारी श्री जिनचंद्र सूरीजी, श्री जिनकुशल सूरीजी और श्री जिनचंद्र सूरीजी। जब से श्री जिनदत्त सूरीजी ने मणिधारी श्री जिनचंद्र सूरीजी को अपना उत्तराधिकारी बनाया, तब से हर चौथे आचार्य का नाम श्री जिनचंद्र सूरीजी रखा जाता है। लगभग एक हज़ार वर्ष पुरानी इस परंपरा को वर्तमान आचार्य आगे बढ़ा रहे हैं।
सत्य साधना सिखाई जाने की शुरुआत कैसे हुई
सत्य साधना एक प्राचीन साधना है, जो गुरु से शिष्य तक चली आई है और गुरु के मार्गदर्शन में सीखी जाती है। आज इसे खरतरगच्छ के वर्तमान आचार्य, परम पूज्य गुरुदेव श्री पूज्यजी श्री जिनचंद्र सूरीजी महाराज साहब सिखाते हैं।