साधना
नाम का अर्थ
सत्य का अर्थ है सच, और साधना का अर्थ है उस सत्य के साथ रहना और उसका अनुभव करना। सत्य साधना मन के सत्य और स्वयं के सत्य का अनुभव करने की प्रक्रिया है। जब मन अपने सत्य का अनुभव करने लगता है, तो वह भीतर की वास्तविकता को समझने लगता है और समता के साथ वर्तमान क्षण में जीना सीखता है।
मौन ध्यान, अपने ही अनुभव से
सत्य साधना मौन ध्यान की एक पद्धति है, जिसे अपने अनुभव से सीखा जाता है और 10-दिवसीय केंद्र-परिसर शिविरों में सिखाया जाता है। यह ध्यान का एक व्यवस्थित और अनुशासित मार्ग है, जिसका उद्देश्य स्वयं के सच्चे स्वरूप को जानना और एक सुखी, संतुलित व शांत जीवन जीना है।
इसकी नींव
यह साधना 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर की शिक्षाओं में निहित है। इसे खरतरगच्छ परंपरा के उत्तराधिकारी परम पूज्य गुरुदेव श्री पूज्यजी श्री जिनचंद्र सूरीजी महाराज साहब सिखाते हैं।
यह कैसे सिखाई जाती है
आचार्य जी और उनके द्वारा नियुक्त आचार्य भारत और विश्व भर में सत्य साधना सिखाते हैं। केंद्र-परिसर शिविर दो केंद्रों पर होते हैं: बीकानेर के पास नाल में और कोलकाता के पास खेयादा में।
सत्य साधना व्यक्ति को बनाती है
- निर्भय: शांत और संतुलित मन से, फल की अपेक्षा के बिना, हर कार्य करना।
- निर्वैर: सभी प्राणियों के प्रति प्रेम और करुणा रखना।
- निर्लेप: सभी परतों और बंधनों से मुक्त होना।
साधना के चार चरण
दस दिनों में यह साधना चार चरणों में आगे बढ़ती है, और हर चरण पिछले चरण पर आधारित होता है।
चरण 1 · सदाचार
सदाचार
शिविर सदाचार के संकल्प से आरंभ होता है: सत्य, अहिंसा, अचौर्य, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के पाँच नियम, मौन में पालन किए जाते हैं। सादगी और शांति से रहना आगे की साधना के लिए मन को स्थिर करता है।
चरण 2 · श्वास का अवलोकन
श्वास दर्शन
ध्यान ऊपरी होंठ के ऊपर के स्थान पर, आती-जाती स्वाभाविक श्वास पर टिका रहता है, उसे बदले बिना। धीरे-धीरे मन शांत, सजग और एकाग्र होता है।
चरण 3 · भीतर के सत्य का दर्शन
सत्य दर्शन
स्थिर मन के साथ, साधना पूरे शरीर की संवेदनाओं और उनके बदलाव को देखने की ओर मुड़ती है, संतुलन और समता बनाए रखते हुए।
चरण 4 · सबके प्रति मैत्री
मैत्री
शिविर सभी प्राणियों के प्रति सद्भाव के साथ संपन्न होता है, एक भाव जो परिवार, काम और दैनिक जीवन में साथ लौटता है।
सबके लिए खुला
जैन होना, या किसी धर्म का पालन करना आवश्यक नहीं है। शिविर हर उस व्यक्ति के लिए खुले हैं जो सच्चे मन से सीखना चाहता है और शिविर की आचार-संहिता का पालन करने को तैयार है, उसकी पृष्ठभूमि या आस्था जो भी हो।
अपने ही अनुभव से सीखी गई दस दिनों की मौन साधना ऐसे गुण विकसित करने में सहायक होती है जो शिविर के बहुत बाद तक आपके साथ रहते हैं।

- आंतरिक शांतिभीतर की ऐसी शांति, जो आसपास हो रही बातों पर निर्भर नहीं करती।
- समताजीवन के उतार-चढ़ाव का अधिक स्थिर, संतुलित मन से सामना करना।
- एकाग्रताएक शांत मन, जो अपना ध्यान वहीं टिका सके जहाँ आप चाहें।
- कम तनावदिन-भर के तनाव को मन में ढोने के बजाय उसे शांत करना सीखना।
- बेहतर संबंधपरिवार, मित्रों और सहकर्मियों के साथ अधिक धैर्य और समझ।
- करुणादूसरों के प्रति सद्भाव, जो साधना से स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।
- आत्मविश्वासअपने मन को जानने से उपजने वाला स्वयं पर एक शांत विश्वास।
- स्वयं की खोजविश्वास नहीं, अपने प्रत्यक्ष अनुभव से स्वयं को समझना।
सत्य साधना व्यक्ति को बनाती है:
- निर्भयभय से मुक्तशांत और संतुलित मन से, फल की अपेक्षा के बिना, हर कार्य करना।
- निर्वैरवैर से मुक्तसभी प्राणियों के प्रति प्रेम और करुणा रखना।
- निर्लेपअनासक्तसभी परतों और बंधनों से मुक्त होना।